Monday, February 23, 2026

सबके अपने सत्य हैं....आशुतोष राणा

सबके अपने सत्य हैं,
सबके अपने झूठ।
कोई कहता लाभ इसे,
तो किसी को लगती लूट।
सबके अपने कष्ट हैं,
सबकी अपनी जंग।
कोई कभी टूट जाता है,
कोई हो जाता तंग।
सबकी अपनी मान्यता,
सबका निज विश्वास।
कोई कभी दूर हो जाता,
और कोई आता पास।
समय समय की मित्रता,
समय समय की फूट।
कोई कभी रूठ जाता है,
और कोई जाता टूट।
जिसमें ‘मैं’ का फ़ायदा,
‘मैं’ का है नुक़सान।
‘मैं’ का बढ़ता मान देखकर,
‘मैं’ की जलती जान॥

Saturday, February 21, 2026

पचास साल का इंसान / अशोक चक्रधर

पचास साल का इंसान
न बूढ़ा होता है न जवान
न वो बच्चा होता है
न बच्चों की तरह
कच्चा होता है।
वो पके फलों से लदा
एक पेड़ होता है,
आधी उम्र पार करने के कारण
अधेड़ होता है।

पचास साल का इंसान
चुका हुआ नहीं होता
जो उसे करना है
कर चुका होता है,
जवानों से मीठी ईर्ष्या करता है
सद्भावना में फुका होता है

शामिल नहीं होता है
बूढ़ों की जमात में,
बिदक जाता है
ज़रा सी बात में।
बच्चे उससे कतराते हैं
जवान सुरक्षित दूरी अपनाते हैं,
बूढ़े उसके मामलों में
अपना पांव नहीं फंसाते हैं।
क्योंकि वो वैल कैलकुलेटैड
कल्टीवेटैड
पूर्वनियोजित और बार बार संशोधित
पंगे लेता है,

अपने पकाए फल,
अपनी माया, अपनी छाया
आसानी से नहीं देता है।
वो बरगद नहीं होता
बल्कि अगस्त महीने का
मस्त लेकिन पस्त
आम का पेड़ होता है,
जी हां, पचास का इंसान अधेड़ होता है।

यही वह उमर है जब
जब कभी कभी अंदर
बहुत अंदर कुछ क्रैक होता है,
हिम्मत न रखे तो
पहला हार्ट-अटैक होता है।
झटके झेल जाता है,
ज़िन्दगी को खेल जाता है।
क्योंकि उसके सामने
उसी का बनाया हुआ
घौंसला होता है,
इसीलिए जीने का हौसला होता है।

बौड़म जी बोले-
पचास का इंसान
चुलबुले बुलबुलों का एक बबाल है,
पचास की उमर
उमर नहीं है
ट्रांज़ीशन पीरियड है
संक्रमण काल है।

Wednesday, February 18, 2026

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता....वसीम बरेलवी

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता
मगर इन एहतियातों से तअ'ल्लुक़ मर नहीं जाता

बुरे अच्छे हों जैसे भी हों सब रिश्ते यहीं के हैं
किसी को साथ दुनिया से कोई ले कर नहीं जाता

घरों की तर्बियत* क्या आ गई टी-वी के हाथों में
कोई बच्चा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता

खुले थे शहर में सौ दर मगर इक हद के अंदर ही
कहाँ जाता अगर मैं लौट के फिर घर नहीं जाता

मोहब्बत के ये आँसू हैं उन्हें आँखों में रहने दो
शरीफ़ों के घरों का मसअला बाहर नहीं जाता

'वसीम' उस से कहो दुनिया बहुत महदूद** है मेरी
किसी दर का जो हो जाए वो फिर दर दर नहीं जाता

*तर्बियत - परवरिश
**महदूद - सीमित

Friday, February 6, 2026

अच्छा लगा...रामदरश मिश्रा

आज धरती पर झुका आकाश तो अच्छा लगा
सिर किये ऊँचा खड़ी है घास तो अच्छा लगा

आज फिर लौटा सलामत राम कोई अवध में
हो गया पूरा कड़ा बनवास तो अच्छा लगा

था पढ़ाया मांज कर बरतन घरों में रात-दिन
हो गया बुधिया का बेटा पास तो अच्छा लगा

लोग यों तो रोज़ ही आते रहे, आते रहे
आज लेकिन आप आये पास तो अच्छा लगा

क़त्ल, चोरी, रहज़नी व्यभिचार से दिन थे मुखर
चुप रहा कुछ आज का दिन ख़ास तो अच्छा लगा

ख़ून से लथपथ हवाएँ ख़ौफ-सी उड़ती रहीं
आँसुओं से नम मिली वातास तो अच्छा लगा

है नहीं कुछ और बस इंसान तो इंसान है
है जगा यह आपमें अहसास तो अच्छा लगा

हँसी हँसते हाट की इन मरमरी महलों के बीच
हँस रहा घर-सा कोई आवास तो अच्छा लगा

रात कितनी भी घनी हो सुबह आयेगी ज़रूर
लौट आया आपका विश्वास तो अच्छा लगा

आ गया हूँ बाद मुद्दत के शहर से गाँव में
आज देखा चाँदनी का हास तो अच्छा लगा

दोस्तों की दाद तो मिलती ही रहती है सदा
आज दुश्मन ने कहा–शाबाश तो अच्छा लगा

Wednesday, February 4, 2026

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे...रामदरश मिश्रा

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे धीरे

किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला
कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे धीरे

जहाँ आप पहुँचे छलांगें लगा कर
वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे धीरे

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी
उठाता गया यूँ ही सर धीरे धीरे

गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया
गया दर्द से घाव भर धीरे धीरे

Friday, January 30, 2026

इतना मलाल थोड़ी है...परवीन शाकिर

मलाल है मगर इतना मलाल थोड़ी है,
ये आंख रोने की शिद्दत से लाल थोड़ी है |


बस अपने वास्ते ही फ़िक़्रमंद हैं सब लोग,
यहां किसी को किसी का ख़याल थोड़ी है |


परों को काट दिया है उड़ान से पहले,
ये ख़ौफ़ ए हिज्र है शौक़ ए विसाल थोड़ी है |


मज़ा तो तब है कि हम हार के भी हंसते रहें,
हमेशा जीत ही जाना कमाल थोड़ी है |


लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले,
ग़ुरूब होने का मतलब ज़वाल थोड़ी है |


Sunday, January 25, 2026

यह क्या हो गया मुझे....सलमान अख़्तर

जीना अज़ाब* क्यूँ है, यह क्या हो गया मुझे 
किस शख्स की लगी है भला बददुआ मुझे  

निकले थे दोनों भेस बदलकर तो क्या अजब 
मैं ढूंढ़ता खुदा को फिरा और खुदा मुझे 

इस घर के कोने कोने में यादों के भूत हैं 
अलमारियाँ न खोल बहुत मत डरा मुझे 

पूजेंगे मुझको गांव के सब लोग एक दिन 
मैं एक पुराना पेड़ हूँ तू मत गिरा मुझे 

यह कहके मैंने रखा है हर आईने का दिल 
अगले जनम में रूप मिलेगा नया मुझे 

तू मुतमइन** नहीं तो मुझे कब है ऐतराज़ 
मिट्टी को फिरसे गूँथ मेरी फिर बना मुझे 

*कष्ट 
**संतुष्ट 

Sunday, January 18, 2026

अब तो ये भी याद नहीं है...सलमान अख़्तर

हमको उससे शिकवा क्या था अब तो ये भी याद नहीं है 
कैसे उसने दिल तोड़ा था अब तो ये भी याद नहीं है 

आज तो उसकी हर कमज़ोरी साफ दिखाई देती है 
पहले उसमें क्या देखा था अब तो ये भी याद नहीं है 

उसको हम पहचान गए हैं अंदर क्या है जान गए हैं
फिर भी धोखा क्यूँ खाया था अब तो ये भी याद नहीं है 

ज़ाम था, दिल था, या फिर उनसे किया कोई एक वादा था 
रात नशें मे क्या टूटा था अब तो यह भी याद नहीं है