Thursday, June 18, 2026

गिरो...By हूबनाथ पांडे

गिरो !

गिरो 
कि अभी और गिरने की 
संभावनाएं भरपूर हैं 
इतना गिरो
कि गुरूत्वाकर्षण बल भी 
शर्म के मारे गिर पड़े | 

अभी तो
गिरने की शुरूआत है 
गिरने के 
अपने सामर्थ्य पर 
भरोसा गिरने मत दो 
सारा विश्व 
तुम्हारा गिरना 
देख रहा है 
और ख़ुद 
न गिर पाने पर 
अफ़सोस कर रहा है 

गिरो !
पर अकेले मत गिरो 
रूपये के साथ गिरो 
चरित्र के साथ गिरो 
गर्व के साथ गिरो 
कि एक तुम्हीं हो 
जिसमें गिरने का 
इतना साहस है | 

साहस के साथ गिरो 
बेशर्मी के साथ गिरो 
बेदर्दी के साथ गिरो 
कि दुनिया तुमसे 
गिरना सीख रही है 

किसी एक ही 
मामले में सही 
तुम्हें विश्वगुरु होने से 
कोई रोक नहीं सकता 

आनेवाली पीढ़ियां 
तुम्हारे गिरने में 
अपने गिरने की 
संभावनाएं तलाशेंगी 
वे तुमसे भी ज्यादा 
गिरने का पराक्रम करेंगी 

उनके पराक्रम पर 
यकीन करते हुए 
ज़रा और ज़ोर से गिरो 
थोड़े शोर से गिरो 
चारों और से गिरो 
निपट भोर से गिरो 
और गिरते रहो 

यह सच है 
कि इससे पहले 
तुम्हारी तरह 
कोई नहीं गिरा 
इसका कोई नहीं गिला 

तुम्हें तो खुश होना चाहिए 
कि सदियों से खड़े समाज को 
तुम गिरना सिखा रहे हो 
एक ही जगह खड़े खड़े 
लोग जड़ हो गए थे 
उन्हें जड़ से तुम्हीं हटा रहे हो 
यह कोई आसान काम नहीं 
जो तुम ज़माने को बता रहे हो 

जो गिरने में असमर्थ हैं 
वो तुम्हारी आलोचना करेंगे 
इन सबसे घबराना नहीं 
गिरने से डगमगाना नहीं 

आज तक 
जो कुछ 
न गिरने के लिए 
प्रतिबद्ध था 
वह सब लेकर गिरो 
धर्म लेकर गिरो 
कर्म लेकर गिरो 
देश लेकर गिरो 
भेस लेकर गिरो 
पेड़ लेकर गिरो 
रेंड़ लेकर गिरो 
पानी लेकर गिरो 
पहाड़ लेकर गिरो 
सावन लेकर गिरो 
अषाढ़ लेकर गिरो 
प्रकृति लेकर गिरो 
संस्कृति लेकर गिरो 
विकृति लेकर गिरो 

ओ वर्तमान सदी के 
महानतम महापुरुष 
पूरी कायनात को दिखा दो 
कि तुम और कितना गिर सकते हो 

कल हो सकता है 
कि तुम्हारा गिरना 
देखकर ही 
लोगों में उठने की कामना उठे 
आनेवाली पीढ़ियों को 
उठने का अर्थ बताने 
के लिए
कम और ज्यादा 
गिरने का फ़र्क बताने के लिए 
बिना किसी की फ़िक्र 
सिर्फ़ 
और सिर्फ़ 
गिरो !!

गिरते रहो !
जब तक 
गिरने की क्रिया 
निष्क्रिय न हो जाये !!!



Thursday, June 11, 2026

हम करें बात दलीलों से तो रद होती है....मुज़फ़्फ़र वारसी

हम करें बात दलीलों से तो रद होती है
उस के होंटों की ख़मोशी भी सनद होती है


कुछ न कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न
ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है


Wednesday, June 10, 2026

नदी का पानी उतर गया है...डॉ. उदय प्रताप सिंह

पुरानी कश्ती को पार लेकर फ़क़त हमारा हुनर गया है,
नये खेवइये कहीं न समझें नदी का पानी उतर गया है!

Tuesday, May 5, 2026

रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है / राजेश रेड्डी

रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है
जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है

तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए
सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है

जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा
फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है

बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था
एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है

तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से
वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है

Friday, May 1, 2026

मुश्किल से हाँथों में ख़ज़ाना पड़ता है...राहत इंदौरी

मुश्किल से हाँथों में ख़ज़ाना पड़ता है,
पहले कुछ दिन आना जाना पड़ता है

ख़ुश रहना आसान नहीं है दुनिया में,
दुश्मन से भी हाथ मिलाना पड़ता है

इश्क में सचमुच का नहीं तो वादों का,
ताजमहल सबको बनवाना पड़ता है

तू भी फलों का दावेदार निकल आया,
बेटा पहले पेड़ लगाना पड़ता है

मुश्किल फ़न है ग़ज़लों की रोटी खाना,
बहरों को भी शेर सुनाना पड़ता है

Saturday, April 18, 2026

जो बात छुपाई है सबसे...सलमान अख़्तर

जो बात छुपाई है सबसे
वो उनसे छुपानी मुश्किल है
बाहर की कहानी आसाँ है
अंदर की कहानी मुश्किल है

जब उनसे मिलने जाते हैं
मिलते ही बहुत पछताते हैं
हर बात पे ऐसा लगता है
यह बात बतानी मुश्किल है

आया न वतन क्यूँ हमको रास
किस जुर्म पर पाया है वनवास
किस मोड़ पे सीता छूट गई
यह राम कहानी मुश्किल है


Thursday, April 16, 2026

तुम बैठे हो लेकिन जाते देख रहा हूँ ..By जावेद अख़्तर

तुम बैठे हो लेकिन जाते देख रहा हूँ 
मैं तनहाई के दिन आते देख रहा हूँ 

आने वाले लम्हे से दिल सहमा है
तुमको भी डरते घबराते देख रहा हूँ

कब यादो का जख्म भरे कब दाग मिटे
कितने दिन लगते है भुलाते देख रहा हूँ

उसकी आखो मे भी काजल फैला है
मैं भी मुड़ के जाते जाते देख रहा हूँ 

Thursday, April 9, 2026

यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है....By राजेश रेड्डी

यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है
खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है

मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा
बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है

न बस में ज़िंदगी उस के न क़ाबू मौत पर उस का
मगर इंसान फिर भी कब ख़ुदा होने से डरता है

अजब ये ज़िंदगी की क़ैद है दुनिया का हर इंसाँ
रिहाई माँगता है और रिहा होने से डरता है

Saturday, April 4, 2026

नयी-नयी आँखें / निदा फ़ाज़ली

नयी-नयी आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है
कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन, अब घर अच्छा लगता है ।

मिलने-जुलनेवालों में तो सारे अपने जैसे हैं
जिससे अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है ।

चाहत हो या पूजा सबके अपने-अपने साँचे हैं
जो मूरत में ढल जाये वो पैकर (चेहरा) अच्छा लगता है ।

हमने भी सोकर देखा है नये-पुराने शहरों में
जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है ।

Friday, March 27, 2026

मन रे, तू काहे ना धीर धरे...साहिर लुधियानवी

मन रे, तू काहे ना धीर धरे?
वो निर्मोही, मोह ना जाने
जिनका मोह करे
मन रे, तू काहे ना धीर धरे?


इस जीवन की चढ़ती-ढलती
धूप को किस ने बाँधा?
रंग पे किस ने पहरे डाले?
रूप को किस ने बाँधा?
काहे ये जतन करे?
मन रे, तू काहे ना धीर धरे?


उतना ही उपकार समझ
कोई जितना साथ निभा दे
जनम-मरन का मेल है सपना
ये सपना बिसरा दे
कोई ना संग मरे
मन रे, तू काहे ना धीर धरे?


वो निर्मोही, मोह ना जाने
जिनका मोह करे
हो, मन रे, तू काहे ना धीर धरे?

Monday, March 23, 2026

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो...राहत इंदौरी

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें
रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो

एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो
दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो

आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में
कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे
नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो

ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन
दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो

Monday, February 23, 2026

सबके अपने सत्य हैं....आशुतोष राणा

सबके अपने सत्य हैं,
सबके अपने झूठ।
कोई कहता लाभ इसे,
तो किसी को लगती लूट।
सबके अपने कष्ट हैं,
सबकी अपनी जंग।
कोई कभी टूट जाता है,
कोई हो जाता तंग।
सबकी अपनी मान्यता,
सबका निज विश्वास।
कोई कभी दूर हो जाता,
और कोई आता पास।
समय समय की मित्रता,
समय समय की फूट।
कोई कभी रूठ जाता है,
और कोई जाता टूट।
जिसमें ‘मैं’ का फ़ायदा,
‘मैं’ का है नुक़सान।
‘मैं’ का बढ़ता मान देखकर,
‘मैं’ की जलती जान॥

Saturday, February 21, 2026

पचास साल का इंसान / अशोक चक्रधर

पचास साल का इंसान
न बूढ़ा होता है न जवान
न वो बच्चा होता है
न बच्चों की तरह
कच्चा होता है।
वो पके फलों से लदा
एक पेड़ होता है,
आधी उम्र पार करने के कारण
अधेड़ होता है।

पचास साल का इंसान
चुका हुआ नहीं होता
जो उसे करना है
कर चुका होता है,
जवानों से मीठी ईर्ष्या करता है
सद्भावना में फुका होता है

शामिल नहीं होता है
बूढ़ों की जमात में,
बिदक जाता है
ज़रा सी बात में।
बच्चे उससे कतराते हैं
जवान सुरक्षित दूरी अपनाते हैं,
बूढ़े उसके मामलों में
अपना पांव नहीं फंसाते हैं।
क्योंकि वो वैल कैलकुलेटैड
कल्टीवेटैड
पूर्वनियोजित और बार बार संशोधित
पंगे लेता है,

अपने पकाए फल,
अपनी माया, अपनी छाया
आसानी से नहीं देता है।
वो बरगद नहीं होता
बल्कि अगस्त महीने का
मस्त लेकिन पस्त
आम का पेड़ होता है,
जी हां, पचास का इंसान अधेड़ होता है।

यही वह उमर है जब
जब कभी कभी अंदर
बहुत अंदर कुछ क्रैक होता है,
हिम्मत न रखे तो
पहला हार्ट-अटैक होता है।
झटके झेल जाता है,
ज़िन्दगी को खेल जाता है।
क्योंकि उसके सामने
उसी का बनाया हुआ
घौंसला होता है,
इसीलिए जीने का हौसला होता है।

बौड़म जी बोले-
पचास का इंसान
चुलबुले बुलबुलों का एक बबाल है,
पचास की उमर
उमर नहीं है
ट्रांज़ीशन पीरियड है
संक्रमण काल है।

Wednesday, February 18, 2026

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता....वसीम बरेलवी

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता
मगर इन एहतियातों से तअ'ल्लुक़ मर नहीं जाता

बुरे अच्छे हों जैसे भी हों सब रिश्ते यहीं के हैं
किसी को साथ दुनिया से कोई ले कर नहीं जाता

घरों की तर्बियत* क्या आ गई टी-वी के हाथों में
कोई बच्चा अब अपने बाप के ऊपर नहीं जाता

खुले थे शहर में सौ दर मगर इक हद के अंदर ही
कहाँ जाता अगर मैं लौट के फिर घर नहीं जाता

मोहब्बत के ये आँसू हैं उन्हें आँखों में रहने दो
शरीफ़ों के घरों का मसअला बाहर नहीं जाता

'वसीम' उस से कहो दुनिया बहुत महदूद** है मेरी
किसी दर का जो हो जाए वो फिर दर दर नहीं जाता

*तर्बियत - परवरिश
**महदूद - सीमित

Friday, February 6, 2026

अच्छा लगा...रामदरश मिश्रा

आज धरती पर झुका आकाश तो अच्छा लगा
सिर किये ऊँचा खड़ी है घास तो अच्छा लगा

आज फिर लौटा सलामत राम कोई अवध में
हो गया पूरा कड़ा बनवास तो अच्छा लगा

था पढ़ाया मांज कर बरतन घरों में रात-दिन
हो गया बुधिया का बेटा पास तो अच्छा लगा

लोग यों तो रोज़ ही आते रहे, आते रहे
आज लेकिन आप आये पास तो अच्छा लगा

क़त्ल, चोरी, रहज़नी व्यभिचार से दिन थे मुखर
चुप रहा कुछ आज का दिन ख़ास तो अच्छा लगा

ख़ून से लथपथ हवाएँ ख़ौफ-सी उड़ती रहीं
आँसुओं से नम मिली वातास तो अच्छा लगा

है नहीं कुछ और बस इंसान तो इंसान है
है जगा यह आपमें अहसास तो अच्छा लगा

हँसी हँसते हाट की इन मरमरी महलों के बीच
हँस रहा घर-सा कोई आवास तो अच्छा लगा

रात कितनी भी घनी हो सुबह आयेगी ज़रूर
लौट आया आपका विश्वास तो अच्छा लगा

आ गया हूँ बाद मुद्दत के शहर से गाँव में
आज देखा चाँदनी का हास तो अच्छा लगा

दोस्तों की दाद तो मिलती ही रहती है सदा
आज दुश्मन ने कहा–शाबाश तो अच्छा लगा

Wednesday, February 4, 2026

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे...रामदरश मिश्रा

बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे धीरे

किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला
कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे धीरे

जहाँ आप पहुँचे छलांगें लगा कर
वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे धीरे

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी
उठाता गया यूँ ही सर धीरे धीरे

गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया
गया दर्द से घाव भर धीरे धीरे

Friday, January 30, 2026

इतना मलाल थोड़ी है...परवीन शाकिर

मलाल है मगर इतना मलाल थोड़ी है,
ये आंख रोने की शिद्दत से लाल थोड़ी है |


बस अपने वास्ते ही फ़िक़्रमंद हैं सब लोग,
यहां किसी को किसी का ख़याल थोड़ी है |


परों को काट दिया है उड़ान से पहले,
ये ख़ौफ़ ए हिज्र है शौक़ ए विसाल थोड़ी है |


मज़ा तो तब है कि हम हार के भी हंसते रहें,
हमेशा जीत ही जाना कमाल थोड़ी है |


लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले,
ग़ुरूब होने का मतलब ज़वाल थोड़ी है |


Sunday, January 25, 2026

यह क्या हो गया मुझे....सलमान अख़्तर

जीना अज़ाब* क्यूँ है, यह क्या हो गया मुझे 
किस शख्स की लगी है भला बददुआ मुझे  

निकले थे दोनों भेस बदलकर तो क्या अजब 
मैं ढूंढ़ता खुदा को फिरा और खुदा मुझे 

इस घर के कोने कोने में यादों के भूत हैं 
अलमारियाँ न खोल बहुत मत डरा मुझे 

पूजेंगे मुझको गांव के सब लोग एक दिन 
मैं एक पुराना पेड़ हूँ तू मत गिरा मुझे 

यह कहके मैंने रखा है हर आईने का दिल 
अगले जनम में रूप मिलेगा नया मुझे 

तू मुतमइन** नहीं तो मुझे कब है ऐतराज़ 
मिट्टी को फिरसे गूँथ मेरी फिर बना मुझे 

*कष्ट 
**संतुष्ट 

Sunday, January 18, 2026

अब तो ये भी याद नहीं है...सलमान अख़्तर

हमको उससे शिकवा क्या था अब तो ये भी याद नहीं है 
कैसे उसने दिल तोड़ा था अब तो ये भी याद नहीं है 

आज तो उसकी हर कमज़ोरी साफ दिखाई देती है 
पहले उसमें क्या देखा था अब तो ये भी याद नहीं है 

उसको हम पहचान गए हैं अंदर क्या है जान गए हैं
फिर भी धोखा क्यूँ खाया था अब तो ये भी याद नहीं है 

ज़ाम था, दिल था, या फिर उनसे किया कोई एक वादा था 
रात नशें मे क्या टूटा था अब तो यह भी याद नहीं है

Monday, September 8, 2025

अब्राहम लिंकन की एक कविता शिक्षक के नाम...

हे शिक्षक!

मैं जानता हूं और मानता हूं
कि न तो हर आदमी सही होता है
और न ही होता है सच्चा;
किंतु तुम्हें सिखाना होगा कि 
कौन बुरा है और कौन अच्छा 

दुष्ट व्यक्तियों के साथ-साथ आदर्श प्रणेता भी होते हैं,
स्वार्थी राजनीतिज्ञों के साथ-साथ समर्पित नेता भी होते हैं 
दुश्मनों के साथ-साथ मित्र भी होते हैं
हर विरूपता के साथ सुंदर चित्र भी होते हैं

समय भले ही लग जाए, पर
यदि सिखा सको तो उसे सिखाना 
कि पाए हुए पांच से अधिक मूल्यवान है - 
स्वयं एक कमाना 

पाई हुई हार को कैसे झेले, उसे यह भी सिखाना 
और साथ ही सिखाना, जीत की ख़ुशियां मनाना।
यदि हो सके तो उसे ईर्ष्या या द्वेष से परे हटाना
और जीवन में छुपी मौन मुस्कान का पाठ पढ़ाना।

जितनी जल्दी हो सके उसे जानने देना 
कि दूसरों को आतंकित करने वाला स्वयं कमज़ोर होता है, 
वह भयभीत व चिंतित है
क्योंकि उसके मन में स्वयं चोर होता है।

उसे दिखा सको तो दिखाना -
किताबों में छिपा खजाना।
और उसे वक़्त देना चिंता करने के लिए
कि आकाश के परे उड़ते पंछियों का आह्लाद
सूर्य के प्रकाश में मधुमक्खियों का निनाद
हरी-भरी पहाड़ियों से झांकते फूलों का संवाद
कितना विलक्षण होता है - अविस्मरणीय, अगाध

उसे यह भी सिखाना -
धोके से सफ़लता पाने से असफ़ल होना सम्माननीय है
और अपने विचारों पर भरोसा रखना अधिक विश्वसनीय है
चाहें अन्य सभी उनको ग़लत ठहराएं 
परंतु स्वयं पर अपनी आस्था बनी रहे, यह विचारणीय है।

उसे यह भी सिखाना कि वह सदय का साथ सदय हो
किंतु कठोर के साथ हो कठोर।
और लकीर का फ़कीर बनकर
उस भीड़ के पीछे न भागे जो करती हो - निरर्थक शोर।

उसे सिखाना
कि वह सबकी सुनते हुए अपने मन की भी सुन सके,
हर तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसकर गुन सके।
यदि सिखा सको तो सिखाना कि वह दुख में भी मुस्कुरा सके,
घनी वेदना से आहत हो, पर ख़ुशी के गीत गा सके। 
उसे यह भी सिखाना कि आंसू बहते हों तो उन्हें बहने दे,
इसमें कोई शर्म नहीं, कोई कुछ भी कहता हो, कहने दे।

उसे सिखाना -
कि वह सनकियों को कनखियों से हंसकर टाल सके
पर अत्यंत मृदुभाषी से बचने का खयाल रखे।
वह अपने बाहुबल व बुद्धिबल का अधिकतम मोल पहचान पाए,
परंतु अपने ह्र्दय व आत्मा की बोली न लगवाए।

वह भीड़ के शोर में भी अपने कान बंद कर सके
और स्वत: की अंतरात्मा की सही आवाज़ सुन सके।
सच के लिए लड़ सके और सच के लिए अड़ सके।

उसे सहानुभूति से समझाना, 
पर प्यार के अतिरेक से मत बहलाना।
क्योंकि तप-तप कर ही लोहा खरा बनता है,
ताप पाकर ही सोना निखरता है।
उसे साहस देना ताकि वक़्त पड़ने पर अधीर बने
सहनशील बनाना ताकि वह वीर बने।

उसे सिखाना कि वह स्वयं पर असीम विश्वास करे,
ताकि समस्त मानव जाति पर भरोसा व आस धरे।

यह एक बड़ा सा लंबा-चौड़ा अनुरोध है,
पर तुम कर सकते हो, क्या इसका तुम्हें बोध है?
मेरे और तुम्हारे... दोनों के साथ उसका रिश्ता है;
सच मानो, मेरा बेटा एक प्यारा-सा नन्हा सा फ़रिश्ता है।

Thursday, August 14, 2025

उस मोड़ से शुरू करें / सुदर्शन फ़ाकिर

उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी
हर शय जहाँ हसीन थी, हम तुम थे अजनबी

लेकर चले थे हम जिन्हें जन्नत के ख़्वाब थे
फूलों के ख़्वाब थे वो मुहब्बत के ख़्वाब थे
लेकिन कहाँ है उन में वो पहली सी दिलकशी

रहते थे हम हसीन ख़यालों की भीड़ में
उलझे हुए हैं आज सवालों की भीड़ में
आने लगी है याद वो फ़ुर्सत की हर घड़ी

शायद ये वक़्त हमसे कोई चाल चल गया
रिश्ता वफ़ा का और ही रंगो में ढल गया
अश्कों की चाँदनी से थी बेहतर वो धूप ही

Monday, June 2, 2025

अच्छा नहीं लगता...जावेद अख़्तर

जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल* रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ाएदे इसमें मगर अच्छा नहीं लगता

मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता

बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की ख़ुश्बू तक नहीं आती
ये वो शाख़ें हैं जिन को अब शजर** अच्छा नहीं लगता

ये क्यूँ बाक़ी रहे आतिश-ज़नो ये भी जला डालो
कि सब बे-घर हों और मेरा हो घर अच्छा नहीं लगता

* इसका अर्थ है कि कोई चीज/रास्ता जो पहले से ही इस्तेमाल की गई है, या उस पर बार-बार पैर रखे जा चुके हैं
** शजर का अर्थ पेड़ होता है

ज़रा देख तो लो...जावेद अख़्तर

जीना मुश्किल है कि आसान ज़रा देख तो लो
लोग लगते हैं परेशान ज़रा देख तो लो

ये नया शहर तो है ख़ूब बसाया तुम ने
क्यूँ पुराना हुआ वीरान ज़रा देख तो लो

इन चराग़ों के तले ऐसे अँधेरे क्यूँ है
तुम भी रह जाओगे हैरान ज़रा देख तो लो

तुम ये कहते हो कि मैं ग़ैर हूँ फिर भी शायद
निकल आए कोई पहचान ज़रा देख तो लो

ये सताइश* की तमन्ना ये सिले** की परवाह
कहाँ लाए हैं ये अरमान ज़रा देख तो लो

*प्रशंसा
**परिणाम

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों / गोपालदास "नीरज"

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है।

सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है।

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है।

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चांदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चन्द खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।

लाखों बार गगरियाँ फूटीं,
शिकन न आई पनघट पर,
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल-पहल वो ही है तट पर,
तम की उमर बढ़ाने वालों! लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी न लेकिन गन्ध फूल की,
तूफानों तक ने छेड़ा पर,
खिड़की बन्द न हुई धूल की,
नफरत गले लगाने वालों! सब पर धूल उड़ाने वालों!
कुछ मुखड़ों की नाराज़ी से दर्पन नहीं मरा करता है!

Sunday, May 25, 2025

कब लौट के आओगे बता क्यों नहीं देते... By सलमान अख़्तर

कब लौट के आओगे बता क्यों नहीं देते
दीवार बहानों की गिरा क्यों नहीं देते

तुम पास हो मेरे तो पता क्यों नहीं चलता
तुम दूर हो मुझसे तो सदा* क्यों नहीं देते

कुछ घुट सी गयीं हैं मेरे जज़्बात की साँसे 
तुम अपने इरादों की हवा क्यों नहीं देते 

एक अपने सिवा और किसी को भी न चाहा 
ये बात ज़माने को बता क्यों नहीं देते 

बाहर की हवाओं का अगर खौफ है इतना
जो रौशनी अंदर है, बुझा क्यों नहीं देते

*आवाज़