Friday, March 27, 2026

मन रे, तू काहे ना धीर धरे...साहिर लुधियानवी

मन रे, तू काहे ना धीर धरे?
वो निर्मोही, मोह ना जाने
जिनका मोह करे
मन रे, तू काहे ना धीर धरे?


इस जीवन की चढ़ती-ढलती
धूप को किस ने बाँधा?
रंग पे किस ने पहरे डाले?
रूप को किस ने बाँधा?
काहे ये जतन करे?
मन रे, तू काहे ना धीर धरे?


उतना ही उपकार समझ
कोई जितना साथ निभा दे
जनम-मरन का मेल है सपना
ये सपना बिसरा दे
कोई ना संग मरे
मन रे, तू काहे ना धीर धरे?


वो निर्मोही, मोह ना जाने
जिनका मोह करे
हो, मन रे, तू काहे ना धीर धरे?

Monday, March 23, 2026

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो...राहत इंदौरी

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

राह के पत्थर से बढ़ कर कुछ नहीं हैं मंज़िलें
रास्ते आवाज़ देते हैं सफ़र जारी रखो

एक ही नद्दी के हैं ये दो किनारे दोस्तो
दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो

आते जाते पल ये कहते हैं हमारे कान में
कूच का ऐलान होने को है तय्यारी रखो

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ाएम रहे
नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो

ये हवाएँ उड़ न जाएँ ले के काग़ज़ का बदन
दोस्तो मुझ पर कोई पत्थर ज़रा भारी रखो