Tuesday, May 5, 2026

रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है / राजेश रेड्डी

रोज़ सवेरे दिन का निकलना, शाम में ढलना जारी है
जाने कब से रूहों का ये ज़िस्म बदलना जारी है

तपती रेत पे दौड़ रहा है दरिया की उम्मीद लिए
सदियों से इन्सान का अपने आपको छलना जारी है

जाने कितनी बार ये टूटा जाने कितनी बार लुटा
फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है

बरसों से जिस बात का होना बिल्कुल तय सा लगता था
एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है

तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से
वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है

Friday, May 1, 2026

मुश्किल से हाँथों में ख़ज़ाना पड़ता है...राहत इंदौरी

मुश्किल से हाँथों में ख़ज़ाना पड़ता है,
पहले कुछ दिन आना जाना पड़ता है

ख़ुश रहना आसान नहीं है दुनिया में,
दुश्मन से भी हाथ मिलाना पड़ता है

इश्क में सचमुच का नहीं तो वादों का,
ताजमहल सबको बनवाना पड़ता है

तू भी फलों का दावेदार निकल आया,
बेटा पहले पेड़ लगाना पड़ता है

मुश्किल फ़न है ग़ज़लों की रोटी खाना,
बहरों को भी शेर सुनाना पड़ता है