Saturday, October 19, 2024

ख़ुमार बाराबंकवी की ग़ज़लें...

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है हवा चल रही है
-------------------
आँखों के चराग़ों में उजाले न रहेंगे
आ जाओ कि फिर देखने वाले न रहेंगे
-----------------------
वही फिर मुझे याद आने लगे हैं
जिन्हें भूलने में ज़माने लगे हैं
----------------------
मुझ को शिकस्त-ए-दिल का मज़ा याद आ गया
तुम क्यूँ उदास हो गए क्या याद आ गया

कहने को ज़िंदगी थी बहुत मुख़्तसर मगर
कुछ यूँ बसर हुई कि ख़ुदा याद आ गया

बरसे बग़ैर ही जो घटा घिर कर खुल गयी एक बेवफ़ा का अहद ए वफ़ा याद आ गया
---------------------------
अकेले हैं वो और झुँझला रहे हैं
मिरी याद से जंग फ़रमा रहे हैं

ये कैसी हवा-ए-तरक़्क़ी चली है
दिए तो दिए दिल बुझे जा रहे हैं

इलाही मिरे दोस्त हों ख़ैरियत से
ये क्यूँ घर में पत्थर नहीं आ रहे हैं
-----------------------
तिरे दर से उठ कर जिधर जाऊँ मैं
चलूँ दो क़दम और ठहर जाऊँ मैं

सँभाले तो हूँ ख़ुद को तुझ बिन मगर
जो छू ले कोई तो बिखर जाऊँ मैं
-----------------

No comments: